बच्चों को भी दे समय

family अग. २९, २०१९


आज मैं जिस विषय पर बात करने जा रही हूँ वो थोड़ा हटके है मेरी दूसरी ब्लॉग पोस्ट के मुक़ाबले में। आप सब जानते हैं आज कम्प्यूटर का ज़माना है सिर्फ़ बच्चे ही नहीं बड़े भी इसका भरपूर फ़ायदा उठा रहे हैं। आज हम घर बैठे देश – विदेश और पूरी दुनिया में किसी भी चीज़ की जानकारी ले सकते हैं। जहाँ एक तरफ़ इन सब सुविधाओं के होने का फ़ायदा हुआ है वहीं इसका बहुत बुरा असर हमारे बच्चों के बचपन पर हुआ है। ख़ासतौर पर शहरों में रहने वाले बच्चों पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। एक तो बच्चों के पास खेलने के लिए जगह की बहुत कमी होती है। इसलिए बच्चों को खेलने के लिए किसी पार्क या आस – पास जो खेलने लायक़ बड़ी जगह होती है वहाँ जाना पड़ता है। इस वजह से बहुत से बच्चे घर की चारदीवारी में ही रहते हैं। घर में वो अकेले होने से खेल नहीं पाते और जल्दी ही बोर हो जाते है फिर मम्मियों को अपने साथ खेलने को बोलते हैं पर घर के कामों में व्यस्त होने के कारण माँ उनके साथ नहीं खेल पाती जिससे बच्चे उनको परेशान करना शुरू कर देते है और हम लोग परेशान होकर उनको फ़ोन या फिर टी वी (TV) लगा कर दे देते हैं क्योंकि हमारे पास ना तो इतना टाइम होता की हम उनको खेलने के लिए बाहर लेकर जा सकें और ना ही उनके साथ घर में खेल सकते हैं।

बच्चों के साथ बिताया गया आपका समय उनके शारीरिक और मानसिक विकास में सहायक होता है।

हमारे बचपन के दिनों में इंटर्नेट नहीं था इसलिए हम लोग बाहर खेलने जाते थे और माता – पिता को पता भी नहीं होता था कि हमलोग कहाँ खेल रहे हैं या कैसे खेल रहे हैं। सब लोग एक दूसरे पर विश्वास करते थे। आज की तरह असुरक्षित माहौल नहीं होता था। लड़का हो या लड़की किसी को लेकर किसी तरह का डर नहीं होता था हम एकदम आज़ाद पंछी की तरह ही तो घूमते थे। बच्चे एक दूसरे के साथ मिलकर खेलते थे इसलिए उस समय बच्चों के बीच में इतनी अच्छी दोस्ती होती थी। खेलने से उनके मानसिक विकास के साथ – साथ शारीरिक विकास भी अच्छे से होता था। जब इस सब को याद करते हैं तो लगता है कि हमारे बच्चों का बचपन तो फ़ोन, कम्प्यूटर और टीवी के साथ ही निकल जाएगा। बचपन कितना सुंदर होता है इनको तो पता ही नहीं चलेगा।

बाहर खेलना बच्चों के लिए बेहद ज़रूरी है।

कम्प्यूटर के इस युग ने जहाँ हमें बहुत सी सुविधाएँ दी हैं वहीं बच्चों से इनका बचपन को जीने का मज़ा छीन लिया है। इसलिए आज बच्चे अपनी माँ से ज़्यादा फ़ोन से लगाव रखते हैं। छोटे से छोटे बच्चे के हाथ में आज फ़ोन होता है। बच्चों की भी कोई ग़लती नहीं है और ये लोग कर भी क्या सकते हैं आज जिस तरह की छवि हमारे समाज की हो गयी है उसको देखते हुए बच्चों को बाहर भी नहीं भेज सकते और घर में रहकर बच्चे और क्या करेंगे। मैं आज इस पोस्ट में बच्चों पर मोबाइल फोन के हानिकारक प्रभावों में नहीं बात करूँगी, शायद मैं जल्द ही इसके बारे में एक विस्तृत पोस्ट लिखूँगी जहाँ मैं बच्चों पर मनोविज्ञान, स्वास्थ्य, शिक्षाविदों और चरित्र के संदर्भ में मोबाइल फोन के हानिकारक प्रभावों पर चर्चा करूँगी।

मुझे ये सब देखकर हमारे आने वाले भविष्य की चिंता होने लगती है कि अगर इसी तरह चलता रहा तो हम लोग चलती फिरती मशीनो के अलावा और कुछ भी नहीं रहेंगे। हमारे बच्चों का ना तो मानसिक रूप से अच्छा विकास होगा और ना ही शरारिक रूप से नहीं। अपने बचपन को देखो और अपने बच्चों के बचपन को देखो, कितना फ़र्क़ है। टेक्नोलोजी ने हमारे जीवन को सुगम तो बना दिया पर बाक़ी बहुत सी ऐसी चीज़ें भी हैं जो हमने खो दी हैं। बहुत से ऐसे संस्कार है जो बचपन में ही एक बच्चा सीख लेता था - जैसे आपस में मिलजुल कर रहना, अपनी चीज़ों को दूसरों से बाटना, अच्छे दोस्त बनाना, परिवार से लगाव ये सब जैसे हमारे बच्चे सीख ही नहीं पाते।

बच्चे मिलकर दोस्त बनाना सीखते हैं।

इसलिए अपने बच्चों के साथ ज़्यादा नहीं तो कम से कम दिन में एक घंटा ऐसा निकले जो सिर्फ़ आपका और आपके बच्चे का हो उसके साथ खेले, बातें करे जो मर्ज़ी करें पर उसको समय दे। दिन के २४ घंटे में से एक घंटा तो आप निकल ही सकते हैं अपने बच्चे के लिए। हम हमारे जैसा बचपन तो उन्हें नहीं दे सकते पर एक घंटे के लिए ही सही, आप उसको अपना कुछ समय, प्यार और तवज्जो तो दे सकते हैं जिससे आजकल के बच्चे वंचित रहते है। हम आज उनकी हर इच्छा का ध्यान रखते हैं, नयी से नयी तकनीकी सुविधाए जुटाते हैं, समय से पहले हर चीज़ उनको लाकर देते है क्योंकि ये सब आपके लिए आसान है पर दिन का एक घंटा सिर्फ़ उनके लिए निकालना बहुत मुस्किल। पारिवारिक ताने बाने को बनाए रखने में एक दूसरे के साथ बिताया गया समय ही सबसे अहम भूमिका निभाता है।


सुमित सिंह

मेरा नाम सुमित सिंह है। मैंने इतिहास में स्नातकोत्तर किया है तथा मैं दो सुंदर बेटियों की माँ हूँ।मैंने यह ब्लॉग मेरे जैसी अन्य महिलाओं से बात करने के लिए बनाया हैं।