औरतों की बारात

TYPICAL INDIAN LADIES सित. १३, २०१९


आज मैं समाज के एक ऐसे पहलू की बात करने जा रही हूँ जिसके बारे में अभी तक किसी ने बात करने की हिम्मत नहीं की या यूँ कहें कि किसी के दिमाग़ में इस बात ने कोई असर नहीं डाला। पर मेरे दिमाग़ में बार बार ये बात आती है और मुझे परेशान करती है। सोचा आज आपसे ये परेशानी साँझा करूँ।

यहाँ औरतों की बारात का मतलब जो आप समझ रहे हैं वो नहीं है बल्कि बिलकुल इसका विपरीत है। यहाँ मैं शादी में जाने वाली बारात की नहीं बल्कि औरतों की उस बारात की बात कर रही हूँ जो किसी के मरने पर उसके घर शौक़ में जाती है। “औरतों की बारात " नाम मैंने अपने पास से नहीं रखा है बल्कि उन्ही औरतों के मुँह से सुना है जो किसी के मातम में एकझूँड होकर जाती हैं।

मुझे बहुत विडम्बना के साथ ये लिखना पड़ रहा है कि ये जो औरतें मिलकर वहाँ जाती है इनमे ज़्यादातर का मक़सद किसी के शौक़ में शामिल होना नहीं बल्कि घर से बाहर कुछ देर जाकर घूम के आना और किसी न किसी के बारे में नकारात्मक बातें करना ही इनका मक़सद होता है।

जहाँ पर ये जा रही होती हैं वहाँ जाकर उनको होंसला देने की बजाय ऐसी-ऐसी बातें बोलकर ज़ोर-ज़ोर से रोना शुरू कर देंगी जिनको सुनकर किसी का भी कलेजा फट सकता है। सोचो उस इंसान पर क्या बीतती होगी जो पहले से ही इतने दुःख में है। ऐसा करके आप उसका दुःख बाँट नहीं रहे बल्कि ओर ज़्यादा बढ़ा रहे होते हैं। जो इंसान पहले से ही इतने बुरे हालातों से गुज़र रहा हो उसे आप ओर डरा देते हैं। उसके जीवन में वैसे ही इतना अँधेरा होता है और आप उस अंधरे में एक रोशनी जगाने की बजाय उसको दो चार इधर-उधर के उदाहरण देकर उसे और अंधेरे में धकेल देते हैं। मैंने अपनी आँखों से देखा है जो औरतें शौक़ में आती हैं वो आते ही इतना रोना-धोना मचा देंगी और कुछ ही देर बाद आप देखेंगे की वो आराम से मुस्कुरा रही होती हैं । मज़े से एक दूसरे से बात कर रही होती हैं। जिसका दुःख बाँटने के लिए वो आयी होती हैं वो कहाँ है उनको कोई मतलब नहीं होता। बस उनका काम सिर्फ़ इतना ही होता है कि आते ही इतना रोना- धोना मचा देना की जो शौक़ में है वो और भी ज़्यादा परेशान हो जाए। ख़ुद तो वो थोड़ी देर में नोर्मल हो जाती हैं पर जो शौक़ में है उसके दिमाग़ में आप बहुत सी परेशानियों को पैदा कर आते हैं।

ये परम्परा शादियों से चली आ रही है। इस परम्परा को शुरू करने के पीछे हमारे पूर्वजों का जो मक़सद था वो सही था क्योंकि पुराने ज़माने में ना तो संचार के साधन होते थे और ना परिवहन के।  लोग एक दूसरे से जल्दी से नहीं मिल पाते थे। जब किसी के घर में कोई गुज़र जाता था तो उस इंसान के दुःख में शामिल होने के लिए बहुत दूर का और बहुत मुस्किल सफ़र तय करके लोग उससे मिलने जाते थे और सच में उसके दुःख में शामिल होते थे। पर आज इसका मतलब ही बदल गया है। आज लोग किसी के दुःख में शामिल होने इसलिए नहीं जाते कि वो उसके दुःख से दुखी हैं बल्कि सिर्फ़ दिखावे के लिए जाते हैं कि बस जाकर ये दिखाना होता है कि हम तुम्हारे दुःख में शामिल होने आए हैं।जबकि उनके दुःख से उसको कोई लेना देना नहीं होता।

आप सोच रहे होंगे अगर ऐसे वक्त में हम उस इंसान से नहीं मिलेंगे उसे अकेला छोड़ देंगे तो वो इंसान और भी दुखी हो जाएगा। हाँ, आपकी इस बात से मैं बिलकुल सहमति रखती हूँ पर क्या हम सच में ऐसा करते है? उदाहरण के लिए मैं आपको एक बात बताती हूँ। मान लीजिए किसी औरत का पति गुज़र जाता है उसके बच्चे भी हैं।घर में एक ही कमाने वाला है और वो भी चला गया है। ऐसे में उस इंसान की पत्नी कितना देखी होती है क्या -क्या परेशानियाँ उसके दिमाग़ में चल रही होती हैं। उसे मानसिक और आर्थिक दोनो तरह के सहारे के ज़रूरत होती है। उसे कुछ समझ नहीं आता बस चारों तरफ़ अँधेरा नज़र आता है।ऐसे में हम क्या करते हैं एक तो बारात में इतने लोगों को इकट्ठा करके लेकर जाते हैं की उसको आर्थिक maddaमद्दत करना तो दूर हम उसकी आर्थिक रूप से मुसीबतें ओर भी बढ़ा देते है। ऐसे में हमें चाहिए की उसकी कम से कम आर्थिक रूप से मद्दत करें पर नहीं हमें तो उस वक्त भी दिखावा ही सूझ रहा होता है कि किसकी बारात में सबसे ज़्यादा लोग होंगे।

जहाँ तक मानसिक सहारे की बात है वो भी हम नहीं दे पाते। वो मैं आपको ऊपर ही बता चुकी हूँ।बारात को ले जाकर आप जो महोल बनते हैं उस महोल से वो दुखी इंसान इतना दुखी हो जाता है और सोचता है ये सब कब ख़त्म होगा।अगर आपका वहाँ जाना सच में किसी के दुःख को बाँटना ही होता तो वह इंसान आपके जाने का नहीं बल्कि आपके आने का इंतज़ार कर रहा होता। क्योंकि उसको पता है जो महोल आपने तैयार किया है वो आपके जाने पर ही ख़त्म होगा और तभी उसको मानसिक शांति मिलेगी।

अब आप ही बताइए ऐसी स्तिथि में हमें उस इंसान को मानसिक और आर्थिक सहारा देना चाहिए या वहाँ पे पूरी बारात ले जाकर उसकी दोनो परेशानियों को और बढ़ा देना चाहिए। अगर हम किसी के दुःख से सच में दुखी हैं तो उसका सहारा बनिए। उसे यक़ीन दिलाइए की इस मुस्किल वक्त में वो उसके साथ है। उसकी आर्थिक और मानसिक रूप से उस स्तिथि से बाहर निकलने में उसकी मदत कीजिए। इस घने अंधेरे में उसकी रोशनी की किरण बनिए। उसे बताइए वो अकेला नहीं हैं आप उनके साथ हैं। वहाँ जाकर ज़ोर- ज़ोर से रोने से उसका दुःख नहीं बटेगा बल्कि उसको मानसिक और आर्थिक रूप से मद्दत करके बटेगा। अगर आप इनमे से कोई काम नहीं कर सकते तो महरबानी करके बारात ले जाकर उनकी मुसीबतों को ओर ना बढ़ाइए। अगर आप सच में उसका दुःख बाँटना चाहते है तो आप अकेले ही काफ़ी हैं बारात की ज़रूरत नहीं है।
आपके इस बारे में क्या विचार है मुझे कॉमेंट करके ज़रूर बताइए।


सुमित सिंह

मेरा नाम सुमित सिंह है। मैंने इतिहास में स्नातकोत्तर किया है तथा मैं दो सुंदर बेटियों की माँ हूँ।मैंने यह ब्लॉग मेरे जैसी अन्य महिलाओं से बात करने के लिए बनाया हैं।