बेटियाँ क्या पराया धन हैं?

daughters अग. ११, २०१९


जी आपने बिलकुल ठीक पढ़ा है! इस लेख का शीर्षक एक कथन नहीं बल्कि एक प्रश्न है। हम इस लेख में इस प्रश्न का उत्तर खोजने की कोशिश करेंगे।

सबसे प्रथम में इस कथन के पीछे की दार्शनिक सोच को समझने की कोशिस करता हूँ। जिसने भी यह पहली बार कहा होगा उसके दिमाग़ में इनमे तो से एक कारण रहा होगा।

पहला क़यास मैं यह लगा सकता हूँ की उन्होंने शायद सामाजिक व्यवस्था के कारण ऐसा कहा होगा क्यूँकि आम तौर पर ज़्यादातर संस्कृतियों में लड़कियाँ शादी के उपरांत अपने पति के घर जाकर रहने लग जाती हैं और समाज के हिसाब से यह व्यवस्था एक प्रकार से लड़कियों को शादी के बाद पति के परिवार का हिस्सा मानती है। इसके अनुसार लड़की अपने सभी सुख दुःख और विचारों का दायरा अपने ससुराल तक सीमित कर लेती है। यह ज़रूरी नहीं की लड़की ऐसा करे मगर समाज उससे यही आशा रखता है। मेरे अनुसार यह एक बेहद ग़लत तरीक़ा है एक व्यक्ति के बारे में फ़ैसला लेने का। आप किसी को एक व्यवस्था में झोंक कर तथा उन्हें उसी व्यवस्था के अनुसार आचरण करने का आदेश देकर उनके बारे में यह नहीं कह सकते की वे तो पराए हैं। उन्हें पराया हमने और हमारी सामाजिक व्यवस्था ने बनाया है वे वास्तव में परायी नहीं हैं। एक पति और पिता होने के नाते में देख सकता हूँ किस प्रकार मेरी पत्नी अपने माता पिता के लिए चिंतित रहती है, उसी प्रकार में देख सकता हूँ मेरा जीवन कितना ख़ुशहाल है मेरी बेटियों को कारण। मेरी बेटियाँ मुझे सदा अपने स्वार्थ से निकलकर एक बेहतर इंसान बनने के लिए प्रेरित करती हैं।

दूसरा अनुमान में यह लगा सकता हूँ की शायद उस व्यक्ति ने यह कथन इसलिए कहा होगा की बेटियाँ एक दिन बड़ी होकर किसी और परिवार का आधार बनेंगी तथा वे हमारे वंश की शृंखला से बाहर हो जाएँगी। इस विचारधारा में भी मुझे हमारी एक सामाजिक कमज़ोरी दिखायी देती है। हम सदा यह मानकर चलते हैं की पुरुष ही एक वंश का सूत्रधार होता है। इसी कारण से आप इतिहास की किसी भी सभ्यता का उदाहरण लेकर देखेंगे तो पाएँगे की सभी वंशो, रजवाड़ों तथा रियासतों के नाम सदा पुरुषों के साथ जोड़े जाते हैं। यदि हम अपने पौरुष का अहंकार छोड़कर देखे तो पाएँगे की उन सभी रियासतों, वंशों तथा राज्यों का आधार वे माताएँ, पत्नियाँ तथा बहने जो बेहद धैर्य के साथ अपने कर्तव्य का पालन करती रही। वे माताएँ जिन्होंने अपने पुत्रों को महानता का पाठ पढ़ाया। वे पत्नियाँ जिन्होंने हर प्रकार के हालात में अपने पति का साथ दिया। वे बहनें जिन्होंने अपने भाइयों को त्याग तथा साहस का पाठ पढ़ाया।

तीसरा और अंतिम विचार जो मन में आता है वह यह है की शायद हम ऐसा इसलिए सोचते क्यूँकि हम बेटियों को मनुष्य की श्रेणी में रखते ही नहीं। जिस प्रकार गाँव देहात में पालतू जानवरों को पशुधन की संघ्या दी जाती है हम भी बेटियों को उसी श्रेणी में रखते हैं। जिस प्रकार एक पशु का खूँटा बदल देने से उसका मालिक बदल जाता है और अब वो किसी और का धन बन जाता है हम बेटियों को भी उसी प्रकार एक धन की तरह समझते हैं जिनका एक दिन मालिक बदल दिया जाएगा क्यूँकि हम उन्हें एक नए खूँटे से बाँध देंगे। मैं विवाह को एक खूँटे की तरह नहीं समझता हूँ परंतु में हमारे समाज में व्याप्त हर प्रकार की धारणाओं के अनुसार इस कथन को समझना चाहता हूँ। मैं जानता हूँ समाज में कुछ तबके इस प्रकार की विचारधारा रखते हैं और मेरे अनुसार ऐसे लोगों का मनुष्यों के बीच किसी भी प्रकार का विचार नगण्य है क्यूँकि उन्मे मानवता का मूल भाव ही ग़ायब है। हमें लैटिन में homo sapiens कहा जाता जिसका एक अर्थ homogenious sapiens भी लिया जा सकता है। Homegenious शब्द का अर्थ होता है 'एक जैसे' अर्थात वह प्रजाति जहाँ सभी एक जैसे हों।

अंत में मैं यही कहना चाहूँगा की बेटियाँ ना तो धन होती हैं और ना ही परायी। बेटियाँ समाज का उतना ही ज़रूरी अंग हैं जितना बेटे। बेटों की अति विशिष्ट चाह ने हरियाणा जैसे प्रदेशों का जो हाल किया है उससे स्पष्ट विदित है की बेटियाँ समाज का एक अभिन्न अंग हैं तथा उनको बग़ैर हमारा सामाजिक ढाँचा घूटनों के बल रेंगने लगता है। अपना और अपनी बेटियों का ख़ूब ख़याल रखें जल्द ही फिर वापस आऊँगा नए विचारों के साथ।


प्रदीप सिंह

मेरा नाम प्रदीप है और में यहाँ एक मेहमान लेखक हूँ। अपने व्यग्तिगत जीवन में मैं दो चुलबुली बेटीयों का पिता होने की वजह से मुझे नारी व्यक्तित्व को बेहद नज़दीक से देखने का अवसर प्राप्त हुआ है।