मेरे बारे में

मेरा नाम सुमित सिंह है। मैंने इतिहास में स्नातकोत्तर किया है तथा मैं दो सुंदर बेटियों की माँ हूँ।मैंने यह ब्लॉग मेरे जैसे अन्य महिलाओं से बात करने के लिए बनाया हैं। यहाँ मैं महिलाओं की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सम्बंधित विषयों पे अपने विचार, कहानियाँ और अनुभव साँझे करूँगी।

मेरा नाम सुमित सिंह है। मैंने इतिहास में स्नातकोत्तर किया है तथा मैं दो सुंदर बेटियों की माँ हूँ।मैंने यह ब्लॉग मेरे जैसी अन्य महिलाओं से बात करने के लिए बनाया हैं। यहाँ मैं महिलाओं की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सम्बंधित विषयों पे अपने विचार, कहानियाँ और अनुभव साँझे करूँगी।

हम एक नए समाज में रहते हैं जहाँ इक्कीसवीं शताब्दी की सभी सहूलियतें जैसे बिजली, मीडिया और शिक्षा आम तौर पर उपलब्ध हैं मगर बावजूद इस सब के औरतों को आज भी हमारी सामाजिक व्यवस्था में बराबरी का दर्जा प्राप्त नहीं होता। मेरी दो बेहद प्यारी बेटियाँ हैं और जब मेरी छोटी बेटी का जन्म हुआ तो मेरे तमाम रिस्तेदार मुझे अपनी समझ के अनुसार सांत्वना देने की कोशिश कर रहे थे। उनके मुताबिक़ मैंने दो बेटीयों को जन्म दिया है और मुझे इस बात का बेहद दुःख होना चाहिए की मेरी दूसरी संतान एक बेटा नहीं है। हमारी सामाजिक सोच यहाँ तक संकरी है की मेरी डॉक्टर ने भी मेरे परिवार नियोजन (नसबंधी) के निवेदन को नहीं माना। आज सभी आधुनिक सुविधाएँ तो हम में से ज़्यादातर लोगों की पहुँच में हैं परंतु मानसिकता आज भी दक़ियानूसी है।

इसके पीछे बहुत प्रकार के मूलभूत कारण हैं परंतु मेरी समझ में सबसे महत्वपूर्ण कारण हमारी शिक्षा पद्दती है, फिर मौलिकता का एक आडंबर है जिसके पीछे अनगिनत सदियों से लिखा गया साहित्य है जहाँ महिलाओं को कमज़ोर और बेबस दिखाया गया। जहाँ महिलाओं को एक मज़बूत छवि में पेश भी किया गया वहाँ उनको एक पुरुष की छाया में ऐसा दर्शाया गया है। इसके अतिरिक्त मुझे ऐसा लगता है की हम भी ऐसी स्थिति में बनी रहना चाहती हैं जहाँ हमें सुरक्षित महसूस होता है बेशक इस चक्कर में हम अपनी ख़ुद की एक अलग नियति तय करने से चूक जाती हैं।

मेरे कुछ विचारों से आप शायद सहमत ना हों और आपको इसका पूरा अधिकार है। परंतु इसका यह अर्थ बिलकुल नहीं है की हम एक मुद्दे पर बातचीत नहीं कर सकते। अब तक मैंने इस लेख मैं ज़्यादातर समस्या की व्याख्या की है। इसके बाद मेरे ज़्यादातर लेख समाधान की तरफ़ ज़ोर देकर लिखे जाएँगे ना का समस्या का रोना रोने को लेकर।

आइए हम मिलकर कुछ बात करें, कुछ विचार रखें, कुछ कहानियाँ कहें और कुछ अनुभव एक दूसरे के साथ बाँटें।